देवर-भाभी

रसोई में प्यार

मनोज और भाभी कविता — रसोई में एक सुबह जो खाने की नहीं, कुछ और की थी।

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मनोज की भाभी कविता रोज़ सुबह खाना बनाती थीं। वो भी सुबह उठकर रसोई में आ जाता — चाय के बहाने, मगर असल में भाभी को देखने। एक सुबह कविता का दुपट्टा गैस की आँच के पास पहुँच गया। मनोज ने झपट कर पकड़ा — और उसी में उसने भाभी की कमर भी थाम ली। दोनों जम गए। "छोड़ो," कविता ने कहा, पर आवाज़ में वो धार नहीं थी। मनोज ने हाथ नहीं हटाया। उसने उनकी आँखों में देखा। कविता ने आँखें नहीं फेरीं — यही सबसे बड़ा जवाब था। "भाभी, मैं बहुत दिन से..." उसने कहा। "पता है," कविता ने धीरे से कहा। उसने उनकी कमर अपनी तरफ खींची। कविता के होंठ थोड़े खुले। मनोज ने उन्हें चूमा — पहले माथे पर, फिर गाल पर, फिर होंठों पर। कविता ने आँखें मूँद लीं और उसके सीने से लग गईं। रसोई में गैस बुझ गई। उस सुबह खाना नहीं बना — और किसी को परवाह नहीं थी।
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