सुमन भाभी हर दोपहर देवर अमन का इंतज़ार करती थीं — एक इंतज़ार जो एक दिन सच हो गया।
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सुमन हर दोपहर उसका इंतज़ार करती थीं। पति ऑफिस जाते और देवर अमन घर पर रहता। पहले तो बस बातें होती थीं — चाय पर, टीवी देखते हुए, गप्पें मारते हुए।
फिर एक दिन बातों के बीच उसका हाथ उनके हाथ पर था। किसी ने हटाया नहीं।
धीरे-धीरे दोपहरें बदल गईं। चाय की जगह कुछ और था उनके बीच — एक चुंबकीय खिंचाव जिसे दोनों नाम नहीं दे रहे थे।
एक रोज़ बारिश हो रही थी। सुमन खिड़की बंद करने उठीं तो पीछे से अमन आ गया। उसने खिड़की बंद की, मगर सुमन को नहीं जाने दिया।
"रुको," उसने कहा।
सुमन मुड़ीं नहीं। अमन ने धीरे से उनके बालों को हटाया और गर्दन पर होंठ रख दिए।
सुमन की साँसें थम गईं। उनका दिल तेज़ धड़क रहा था। पूरा शरीर उसकी गर्माहट महसूस कर रहा था।
उन्होंने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया — और यही उनका जवाब था।
उस दिन से इंतज़ार का मतलब बदल गया था। अब इंतज़ार में उम्मीद थी — और हर दोपहर उस उम्मीद को पूरा करती थी।
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