राज और भाभी सीमा — एक दोपहर, एक बहाना, और एक ऐसा पल जो दोनों के दिल में हमेशा रहा।
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राज की भाभी सीमा ने उसे फोन किया था — "बिजली का बिल भरना है, नहीं पता कैसे होता है।" वो आया। असली वजह यह थी या नहीं, दोनों जानते थे।
सीमा ने दरवाज़ा खोला — हल्की साड़ी, बाल खुले, आँखों में वो मासूमियत जो राज को हमेशा बेचैन करती थी।
बिल भरते हुए दोनों सोफे पर पास बैठे। सीमा की महक — चंदन और कुछ मीठा — उसके दिमाग में घूम रही थी।
"हो गया?" सीमा ने पूछा।
"हाँ।" राज ने फोन रखा, मगर उठा नहीं।
सीमा भी नहीं उठीं।
आँखें मिलीं। एक लंबा पल। दोनों बहुत करीब थे — उतने करीब जितना पहले कभी नहीं थे।
"देवर जी..." उनकी आवाज़ काँपी।
राज ने उनका चेहरा हाथों में थाम लिया। सीमा की आँखें बंद हो गईं। उनके होंठ थोड़े खुले — इजाज़त थी वहाँ।
उसने उन्हें चूमा। सीमा ने उसका हाथ थाम लिया।
उस दोपहर वो घर में अकेले नहीं थे। वो साथ थे — पूरी तरह साथ। और उस पल के बाद हर दिन अलग था।
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