देवर-भाभी

बरसात की रात

मानसून की पहली रात, बिजली का कड़कना, और देवर का पास होना — रेखा भाभी की एक यादगार रात।

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मानसून की पहली बड़ी रात थी। बिजली कड़क रही थी और रेखा भाभी डरी हुई थीं। पति आउटस्टेशन पर थे। "सोम, डर लग रहा है," उन्होंने देवर को आवाज़ लगाई। सोम उनके कमरे में आया। रेखा कंबल ओढ़े बैठी थीं। बारिश की आवाज़ में उनकी साँसें तेज़ थीं। "बैठो मेरे पास," उन्होंने कहा। वो बैठ गया। बिजली चमकी और रेखा सिमट कर उससे लिपट गईं — बिना सोचे, बिना रुके। दोनों चुप रहे। बारिश की आवाज़ कमरे में भर गई। फिर सोम ने महसूस किया — भाभी अब डर से नहीं काँप रही थीं। उसने उनका चेहरा उठाया। रेखा की आँखें बंद थीं, होंठ थोड़े खुले, साँस धीमी। "रेखा भाभी..." "चुप रहो," उन्होंने धीरे से कहा। "आज रात बस यही रहने दो।" उसने उनके होंठ चूम लिए। रेखा ने आँखें बंद रखीं और उसे और करीब खींच लिया। बाहर बारिश रुकी नहीं। और कमरे में जो तूफान उठा, वो बाहर की बारिश से कहीं ज़्यादा गहरा था।
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