भाभी नेहा और देवर विकास की एक रात की कहानी — जब घर में अकेलापन और तड़प एक साथ मिले।
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रात के दस बज चुके थे। विकास के भैया शहर से बाहर गए थे, और घर में सिर्फ भाभी नेहा थीं। विकास पढ़ रहा था जब उसने रसोई से भाभी की आवाज़ सुनी।
नेहा भाभी पतली नाइटी में थीं, बाल खुले और आँखों में कुछ अजीब-सी चमक। "खाना खाओगे?" उन्होंने पूछा, मगर आवाज़ में कुछ था जो सिर्फ खाने की बात नहीं थी।
विकास पास आया। थाली रखते वक्त उनकी उँगलियाँ मिलीं — और दोनों ने हाथ नहीं खींचे।
"भाभी..." उसने धीरे से कहा।
नेहा ने आँखें झुका लीं। एक पल की चुप्पी। फिर उन्होंने उठकर कमरे का दरवाज़ा बंद किया।
"बहुत रातें गुज़री हैं अकेले," उन्होंने कहा, आवाज़ काँपती हुई। "आज तुम हो।"
विकास ने उनकी कमर थाम ली। नेहा का सिर उसके सीने पर झुक गया। दोनों के होंठ मिले — पहले धीरे, फिर इस तरह जैसे सालों की प्यास एक साथ बुझानी हो।
नेहा की उँगलियाँ उसके बालों में थीं। विकास की बाहें उनकी कमर के इर्द-गिर्द कसती जा रही थीं। साँसें तेज़ हो गईं। रात गहरी होती गई।
उस रात घर में जो तड़प थी, वो पूरी तरह मिट गई। और जो शुरू हुआ, वो दोनों को हमेशा के लिए बदल गया।
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