देवर-भाभी

गर्मियों की दोपहर

मई की गर्म दोपहर, बंद कमरा, और भाभी पूजा का बुलावा — आयुष के लिए एक अविस्मरणीय दोपहर।

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मई की दोपहर और घर में सन्नाटा। आयुष का पंखा चल रहा था मगर गर्मी कम नहीं हो रही थी। भाभी पूजा बगल के कमरे में थीं। "आयुष, ज़रा आना," उन्होंने आवाज़ लगाई। वो गया तो पाया — भाभी पीठ के बल लेटी थीं, बालों में तेल था और पलकें भारी थीं। "पंखा बंद हो गया मेरे कमरे में। यहाँ सोना है थोड़ी देर।" आयुष कुर्सी पर बैठा। भाभी की साड़ी का पल्लू हट गया था। उसने नज़र हटाने की कोशिश की — नाकाम। "यहाँ आकर लेटो," भाभी ने कहा। "भाभी?" "डरो नहीं।" वो पास आया और लेट गया। कमरे में गर्मी थी, भाभी की साँसें गहरी। पूजा ने उसका हाथ थाम लिया और अपनी कमर पर रख दिया। "बहुत गर्मी है," उन्होंने कहा। आयुष का दिल तेज़ धड़का। उसने उनकी कमर थाम ली — धीरे, फिर पूरी तरह। उस दोपहर बाहर से ज़्यादा गर्मी कमरे के अंदर थी।
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