दीवाली की रोशनी में शिखा भाभी और देवर करण की छत पर हुई एक ऐसी मुलाकात जो दोनों भूल नहीं सके।
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दीवाली की रात सबसे खूबसूरत होती है — रोशनी, खुशबू, और कुछ ऐसी चीज़ें जो सिर्फ अँधेरे में होती हैं।
शिखा भाभी ने उस रात लाल साड़ी पहनी थी। उनके देवर करण की नज़र वहीं टिकी थी।
पटाखों के बाद सब अंदर चले गए। करण और शिखा भाभी छत पर रह गए — दीयों की रोशनी में।
"सुंदर है ना?" शिखा ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा।
"हाँ," करण ने कहा — मगर उसकी नज़र आसमान पर नहीं थी।
शिखा समझ गईं। उन्होंने करण की तरफ देखा।
"करण..."
"भाभी, मैं जानता हूँ यह गलत है।"
"तो क्यों देखते हो ऐसे?"
"क्योंकि रोक नहीं सकता।"
शिखा एक पल रुकीं। दीयों की रोशनी में उनका चेहरा चमक रहा था।
"मैं भी नहीं रोक पाती," उन्होंने आखिरकार कहा।
करण ने उनका हाथ थाम लिया। शिखा उसके करीब आ गईं।
उस रात दीवाली की रोशनी में कुछ और भी जला — और वो बुझा नहीं।
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