तीसरी मंज़िल पर नई किरायेदार श्वेता आई — और रोहन की ज़िंदगी बदल गई।
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तीसरी मंज़िल पर नई किरायेदार आई थी — श्वेता। अकेली रहती थी, काम पर जाती थी, शाम को लौटती थी। रोहन पहली बार उससे सीढ़ियों पर मिला।
"नमस्ते, मैं रोहन हूँ — दूसरी मंज़िल पर।"
"श्वेता।" उसकी मुस्कान में कुछ था।
धीरे-धीरे नमस्ते बातचीत बनी। बातचीत चाय बनी। चाय में वो घंटों बैठे रहते।
एक शाम श्वेता का नल बंद नहीं हो रहा था। रोहन आया। नल ठीक हुआ। मगर दोनों उठे नहीं।
"रोहन जी..." श्वेता ने कहा।
"हाँ?"
"कुछ नहीं।" वो मुस्कुराई।
रोहन ने उसका हाथ थाम लिया। श्वेता ने हटाया नहीं।
"मुझे पता था," रोहन ने कहा।
"क्या?"
"पहले दिन से।"
श्वेता हँसी — फिर उसके करीब आ गई।
उस शाम नया पड़ोसपन कुछ और बन गया। और हर शाम की चाय में उसके बाद एक नई गर्माहट थी।
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