समीर और पड़ोसन आस्था — खिड़की से शुरू हुई कहानी जो एक दिन दरवाज़े तक पहुँची।
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तीसरी मंज़िल की खिड़की के सामने चौथी मंज़िल थी। समीर ने पहली बार उसे देखा था — काले बाल, हल्की साड़ी, बालकनी में पानी डालते हुए।
नाम पता चला — आस्था।
फिर नज़रें मिलने लगीं। आस्था ने पहली बार मुस्कुराई। समीर ने हाथ हिलाया।
एक शाम आस्था ने कागज़ पर नंबर लिखकर दिखाया। समीर ने फोटो खींची।
रात को मैसेज किया।
"नाम पता था तुम्हारा," आस्था ने लिखा।
"मुझे भी।"
"खिड़की से बहुत देखते हो।"
"तुम भी।"
एक हँसी का इमोजी।
"कभी नीचे उतरोगे?"
अगले दिन समीर नीचे था। आस्था दरवाज़े पर थी।
"आओ," उसने कहा।
उसने अंदर कदम रखा। आस्था ने दरवाज़ा बंद किया।
खिड़की की दूरी उस शाम मिट गई — और जो पास हुए, वो फिर दूर नहीं हुए।
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