पड़ोसन

छत पर मुलाकात

विराज और पड़ोसन मेघा — शाम की छत, शहर की रोशनी, और एक अकेलापन जो साथ में मिट गया।

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विराज रोज़ शाम छत पर जाता था — चाय लेकर, अकेले। मगर एक शाम पड़ोसन मेघा भी वहाँ थी। "माफ करना, मैं यहाँ आती हूँ कभी-कभी," उसने कहा। "कोई बात नहीं। बैठिए।" दोनों बैठे। शहर की रोशनी नीचे थी, आसमान ऊपर। हर शाम वो मिलने लगे। फिर एक शाम मेघा ने पूछा — "आप अकेले हैं?" "हाँ।" "मैं भी।" एक लंबी चुप्पी। "तो हम दोनों अकेले हैं और हर शाम मिलते हैं," मेघा ने कहा। "हाँ।" "यह ठीक लगता है।" "बहुत ठीक।" मेघा ने उसकी तरफ देखा। विराज ने भी। उसने हाथ बढ़ाया। मेघा ने उसे थाम लिया। उस शाम छत पर अकेलापन खत्म हो गया। और हर शाम के बाद अब दोनों की छत नहीं — एक ही छत थी।
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