पड़ोसन

मॉनसून की रात

रात के बारह, भारी बारिश, और पड़ोसी कुंज की बालकनी — दिया को उस रात अकेलापन नहीं रहा।

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रात के बारह बज रहे थे और बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। दिया अकेली थी। पड़ोस का कुंज बालकनी में खड़ा था। "डर नहीं लगता अकेले?" उसने पूछा। "थोड़ा," दिया ने माना। "आ जाओ इधर।" दिया छाता लेकर उसकी बालकनी में आ गई। दोनों खड़े रहे — बारिश की आवाज़, ठंडी हवा, और बीच में कोई दूरी नहीं। "अच्छा लगता है ना बारिश में?" कुंज ने कहा। "हाँ, जब अकेले न हों।" कुंज ने उसकी तरफ देखा। दिया बारिश की तरफ देख रही थी — मगर उसके होंठों पर मुस्कान थी। उसने धीरे से उसका हाथ थाम लिया। दिया ने हाथ नहीं हटाया। "बहुत दिन से यही चाहती थी," उसने कहा। "मैं भी।" बारिश में दोनों के बीच की दूरी उस रात खत्म हो गई। और बालकनी पर जो पल था, वो हमेशा याद रहा।
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