गर्मी की दोपहर, बहाने का दरवाज़ा, और पड़ोसन मधु — प्रतीक ने उस दिन सच बोला।
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गर्मी की दोपहर, घर खाली, और पड़ोस की मधु का दरवाज़ा खुला था। प्रतीक ने चाय का बहाना लिया और पहुँच गया।
मधु घर में थी — पतली सूती साड़ी, पसीने में भीगी, आँखों में हैरानी।
"प्रतीक जी?"
"आटा था... नहीं, माचिस थी... नहीं, बस ऐसे ही।" वो हँसा।
मधु भी हँसी। "बैठो।"
चाय बनी। बातें हुईं। धीरे-धीरे बातें कम हुईं और नज़रें ज़्यादा।
"बहुत गर्मी है," मधु ने कहा।
"हाँ।"
"AC नहीं है।"
"जानता हूँ।"
मधु ने पंखे की तरफ देखा, फिर उसकी तरफ।
"यहाँ रुकोगे थोड़ी देर?"
प्रतीक ने उसकी आँखों में देखा। मधु ने नज़र नहीं हटाई।
"हाँ।"
उस दोपहर गर्मी और बढ़ी — मगर किसी को परवाह नहीं थी। दोनों वहाँ थे, साथ थे, और यही काफी था।
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