वेदांत और पड़ोसन नयना — पुरानी हवेली का साझा बरामदा, और हर शाम की मुलाकात जो एक रात बदल गई।
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पुरानी हवेली में बरामदा साझा था। वेदांत और पड़ोसन नयना वहाँ शाम को मिलते थे — बिना तय किए।
बातें होती थीं। किताबें, फिल्में, ज़िंदगी। धीरे-धीरे बातें गहरी होती गईं।
एक शाम नयना ने पूछा — "तुम कभी अकेले नहीं लगते? क्या सोचते हो रात को?"
"तुम्हारे बारे में," वेदांत ने सीधे कहा।
नयना ने एक पल उसे देखा।
"मैं भी।"
बरामदे में रात उतर आई थी। चाँद निकल आया था।
वेदांत उसके पास आया। नयना नहीं हटी।
उसने उसका हाथ थाम लिया।
"डर नहीं लगता?" नयना ने पूछा।
"तुमसे? नहीं।"
नयना मुस्कुराई और उसकी बाहों में आ गई।
बरामदे में उस रात कुछ बदल गया — हमेशा के लिए। और हर शाम की वो बैठक उसके बाद कुछ और थी — उनकी, सिर्फ उनकी।
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