तीन दिन, बच्चे दादी के घर — आस्था और दीपक के लिए सालों बाद वो पुरानी वाली शाम।
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तीन दिन। बच्चे दादी के घर। पहली बार सालों में अकेले।
आस्था और दीपक ने पहले दिन बस यही किया — बैठे रहे, टीवी देखी, सोए।
दूसरे दिन दीपक ने कहा — "चलो कहीं।"
"कहाँ?"
"जहाँ पहले जाते थे।"
वो गए — वही छोटा restaurant, वही corner table।
खाना खाया। बातें हुईं — बिना किसी को interrupt किए।
"कितने दिन हो गए ऐसे?" आस्था ने कहा।
"बहुत।"
"आज..."
"आज वैसे।" दीपक ने उसका हाथ थाम लिया।
रात को घर लौटे। घर खाली था — शांत, सिर्फ उनका।
दीपक ने दरवाज़ा बंद किया और आस्था को बाहों में भर लिया।
"तीन दिन हमारे हैं," उसने कहा।
आस्था ने उसके सीने पर सिर रख दिया।
तीन दिन उनके थे — पूरी तरह उनके।
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